यह लेख भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के प्रमुख मौद्रिक नीति साधनों और फरवरी 2025 तक उनकी हालिया समायोजन पर केंद्रित है। यह आरबीआई के मुख्य उद्देश्यों को उजागर करता है, जिनमें तरलता प्रबंधन, मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक विकास को प्रभावित करना शामिल है। इस लेख में विभिन्न नीति दरों (रेपो रेट, रिवर्स रेपो रेट, एमएसएफ, एसडीएफ, बैंक दर) और रिजर्व आवश्यकताओं (सीआरआर, एसएलआर) की भूमिकाओं का विवरण दिया गया है। इसके अलावा, यह इस बात पर भी प्रकाश डालता है कि आरबीआई द्वारा दरों में किए गए बदलाव ग्राहकों तक तुरंत क्यों नहीं पहुंचते और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए आरबीआई द्वारा अपनाई गई रणनीतियाँ क्या हैं।
यदि आप अंग्रेज़ी में सहज हैं, तो नीचे दिए गए लिंक को अवश्य देखें। ChartForest वेबसाइट पर मौद्रिक नीतियों पर विस्तृत रूप से चर्चा की गई है। वहां चार्ट और टेबल भी शामिल किए गए हैं, जिससे आप इसे आसानी से और बेहतर तरीके से समझ पाएंगे।
![]() |
RBI Monetary Policies |
आरबीआई की मौद्रिक नीति के प्रमुख उद्देश्य
भारतीय रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति का मुख्य उद्देश्य वित्तीय स्थिरता बनाए रखना और सतत आर्थिक विकास को बढ़ावा देना है। इसके मुख्य लक्ष्य निम्नलिखित हैं:
- तरलता प्रबंधन (Liquidity Management) – आरबीआई वित्तीय प्रणाली में धन प्रवाह को नियंत्रित करता है ताकि बाजारों का सुचारू रूप से संचालन हो सके।
- मुद्रास्फीति नियंत्रण (Inflation Control) – आरबीआई का प्राथमिक उद्देश्य मूल्य स्थिरता बनाए रखना और मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना है।
- आर्थिक विकास (Economic Growth) – मौद्रिक नीति का उपयोग आर्थिक विकास की गति को प्रभावित करने के लिए किया जाता है।
आरबीआई की नीति का मूल उद्देश्य वित्तीय प्रणाली में तरलता प्रबंधन, मुद्रास्फीति नियंत्रण और आर्थिक विकास को प्रभावित करना है।
प्रमुख मौद्रिक नीति दरें और हालिया बदलाव (फरवरी 2025)
आरबीआई विभिन्न प्रकार की नीति दरों का उपयोग उधारी लागत और तरलता को नियंत्रित करने के लिए करता है। फरवरी 2025 में किए गए हालिया संशोधनों का विवरण नीचे दिया गया है:
रेपो रेट (Repo Rate) – 6.50% से घटाकर 6.25% कर दिया गया।
यह वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को ऋण देता है। इस कटौती का उद्देश्य वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं के बीच आर्थिक विस्तार का समर्थन करना है।
रिवर्स रेपो रेट (Reverse Repo Rate) – 3.35% पर अपरिवर्तित।
यह वह दर है जिस पर आरबीआई बैंकों से धन उधार लेता है। इसे स्थिर रखने का उद्देश्य नियंत्रित तरलता प्रबंधन सुनिश्चित करना है।
मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) रेट – 6.75% से घटाकर 6.50% कर दिया गया।
यह बैंकों के लिए आपातकालीन ऋण दर है। इसका उद्देश्य शॉर्ट-टर्म उधारी लागत को कम करना और वित्तीय प्रणाली में पर्याप्त तरलता बनाए रखना है।
स्टैंडिंग डिपॉज़िट फैसिलिटी (SDF) रेट – 6.25% से घटाकर 6.00%
यह वह दर है जिस पर बैंक आरबीआई के पास अतिरिक्त धन जमा कर सकते हैं। इसे घटाने का उद्देश्य बैंकों को अधिक धन आरक्षित करने से हतोत्साहित करना है।
बैंक रेट (Bank Rate) – 6.75% से घटाकर 6.50%
यह वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को दीर्घकालिक ऋण देता है। इसका उद्देश्य बैंकों की उधारी लागत को कम करना ताकि वे उपभोक्ताओं और व्यवसायों को सस्ती दरों पर ऋण दे सकें है।
आरक्षित आवश्यकताएँ (फरवरी 2025 में अपरिवर्तित)
आरबीआई तरलता प्रबंधन और बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए न्यूनतम भंडार आवश्यकताओं को भी नियंत्रित करता है।
कैश रिज़र्व रेशियो (CRR) – 4.00% (अपरिवर्तित)
यह वह न्यूनतम धनराशि है जो बैंकों को आरबीआई के पास जमा करनी होती है। इसे स्थिर रखने का उद्देश्य बैंकिंग प्रणाली की स्थिरता सुनिश्चित करना है।
स्टैच्यूटरी लिक्विडिटी रेशियो (SLR) – 18.00% (अपरिवर्तित)
यह न्यूनतम प्रतिशत है जो बैंकों को अपनी शुद्ध मांग और समय देनदारियों का तरल परिसंपत्तियों में बनाए रखना होता है। इसे अपरिवर्तित रखने का उद्देश्य वित्तीय स्थिरता बनाए रखना और बैंकों को पर्याप्त तरलता प्रदान करना है।
ब्याज दर परिवर्तनों का ग्राहकों तक हस्तांतरण (Transmission Lag)
आरबीआई द्वारा ब्याज दरों में बदलाव तुरंत ग्राहकों तक नहीं पहुंचता। इसके पीछे कई कारण होते हैं:
पर्याप्त मौजूदा तरलता (Sufficient Existing Liquidity)
निश्चित ब्याज दरें (Fixed Interest Rates on Deposits)
फिक्स्ड डिपॉजिट और छोटी बचत योजनाओं में निश्चित ब्याज दर होती है। इससे बैंकों के लिए तुरंत उधारी दरों में बदलाव करना कठिन हो जाता है।
लाभप्रदता विचार (Profitability Considerations)
बैंक अपने लाभ को बनाए रखना चाहते हैं, इसलिए वे ऋण दरों को तुरंत कम नहीं करते।
बैंक ऋण पर निर्भरता (Reliance on Bank Loans)
भारत में कॉर्पोरेट बॉन्ड मार्केट छोटा है, इसलिए व्यवसाय बैंक ऋण पर अधिक निर्भर रहते हैं। इससे बैंकों को ब्याज दरें नियंत्रित करने की अधिक शक्ति मिलती है।
मुद्रास्फीति की समझ और नियंत्रण
आरबीआई दो प्रकार की मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने का प्रयास करता है:
मांग-आधारित मुद्रास्फीति (Demand-Pull Inflation)
अधिक पैसा, कम सामान होने पर होता है। इसे नियंत्रित करने के लिए आरबीआई मनी सप्लाई को कम करता है।
आपूर्ति-पक्षीय मुद्रास्फीति (Supply-Side Inflation)
सामान की कमी (जैसे ईंधन की कीमतों में वृद्धि) के कारण होती है। इस पर आरबीआई सीधा नियंत्रण नहीं रखता, और इसे नियंत्रित करने के लिए सरकार को कदम उठाने की आवश्यकता होती है।
निष्कर्ष
भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) मौद्रिक नीति के माध्यम से भारतीय अर्थव्यवस्था को संतुलित करने का प्रयास करता है। फरवरी 2025 में, आरबीआई ने रेपो रेट, एमएसएफ, एसडीएफ और बैंक रेट में कटौती की, जिससे आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने की मंशा साफ होती है। हालांकि, तरलता की मौजूदा स्थिति, निश्चित जमा दरें और बैंकों की लाभप्रदता नीतियाँ दर हस्तांतरण को प्रभावित कर सकती हैं।
मुद्रास्फीति पर नियंत्रण करने के मामले में, आरबीआई मुख्य रूप से मांग-आधारित मुद्रास्फीति को नियंत्रित करता है, जबकि आपूर्ति-संबंधी मुद्रास्फीति के समाधान के लिए सरकारी हस्तक्षेप आवश्यक होता है।
0 comments:
Post a Comment